Day: December 12, 2019

नागरिकता संशोधन विधेयक: भारत का नया ‘मुस्लिम-विरोधी’ कानून क्यों हंगामे का कारण बना

नागरिकता (संशोधन) विधेयक, यानी सिटिज़नशिप (अमेंडमेंट) बिल (Citizenship (Amendment) Bill) या CAB को सोमवार को लोकसभा में पेश किया. इसके ज़रिये पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को नागरिकता दी जा सकेगी. लोकसभा के पिछले कार्यकाल के दौरान यह बिल निष्प्रभावी हो गया था.

विधेयक पेश करने को देखते हुए सत्तारूढ़ भाजपा ने अपने सभी लोकसभा सदस्यों को व्हिप जारी किया कि नौ दिसम्बर से तीन दिनों तक सदन में मौजूद रहें. एक सूत्र ने बताया कि व्हिप में भाजपा (BJP) के सभी सांसदों से सदन में मौजूद रहने के लिए कहा गया है. विधेयक के लोकसभा (Lok Sabha) में आसानी से पारित होने की संभावना है क्योंकि 545 सदस्यीय सदन में भाजपा के 303 सांसद हैं. नागरिकता (संशोधन) विधेयक (Citizenship Amendment Bill) का उद्देश्य छह समुदायों – हिन्दू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध तथा पारसी – के लोगों को भारतीय नागरिकता प्रदान करना है.

बिल के ज़रिये मौजूदा कानूनों में संशोधन किया जाएगा, ताकि चुनिंदा वर्गों के गैरकानूनी प्रवासियों को छूट प्रदान की जा सके. चूंकि इस विधेयक में मुस्लिमों को शामिल नहीं किया गया है, इसलिए विपक्ष ने बिल को भारतीय संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए उसकी आलोचना की है.

ख़बरों के अनुसार, नए विधेयक में अन्य संशोधन भी किए गए हैं, ताकि ‘गैरकानूनी रूप से भारत में घुसे’ लोगों तथा पड़ोसी देशों में धार्मिक अत्याचारों का शिकार होकर भारत में शरण लेने वाले लोगों में स्पष्ट रूप से अंतर किया जा सके.

देश के पूर्वोत्तर राज्यों में इस विधेयक का विरोध किया जा रहा है, और उनकी चिंता है कि पिछले कुछ दशकों में बांग्लादेश से बड़ी तादाद में आए हिन्दुओं को नागरिकता प्रदान की जा सकती है.

नागरिकता (संशोधन) विधेयक का संसद के निचले सदन लोकसभा में आसानी से पारित हो जाना तय है, लेकिन राज्यसभा में, जहां केंद्र सरकार के पास बहुमत नहीं है, इसका पारित हो जाना आसान नहीं होगा.

कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस (TMC), द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK), समाजवादी पार्टी (SP), वामदल तथा राष्ट्रीय जनता दल (RJD) इस बिल के विरोध में हैं, लेकिन राज्यसभा में मतदान की नौबत आने पर ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (AIADMK) जैसी पार्टियां सरकार के पक्ष में संतुलन कायम कर सकती हैं.

BJP की सहयोगी असम गण परिषद (AGP) ने वर्ष 2016 में लोकसभा में पारित किए जाते वक्त बिल का विरोध किया था, और सत्तासीन गठबंधन से अलग भी हो गई थी, लेकिन जब यह विधेयक निष्प्रभावी हो गया, AGP गठबंधन में लौट आई थी.

लोकसभा में विधेयक को पेश किये जाने के लिए विपक्ष की मांग पर मतदान करवाया गया और सदन ने 82 के मुकाबले 293 मतों से इस विधेयक को पेश करने की स्वीकृति दे दी. कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस सहित विपक्षी सदस्यों ने विधेयक को संविधान के मूल भावना एवं अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताते हुए इसे वापस लेने की मांग की. 

गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस, आईयूएमएल, एआईएमआईएम, तृणमूल कांग्रेस समेत विपक्षी सदस्यों की चिंताओं को खारिज करते हुए कहा कि विधेयक कहीं भी देश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं है और इसमें संविधान के किसी अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं किया गया. शाह ने सदन में यह भी कहा ‘अगर कांग्रेस पार्टी देश की आजादी के समय धर्म के आधार पर देश का विभाजन नहीं करती तो इस विधेयक की जरूरत नहीं पड़ती.’ 

NRC क्या है और इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

NRC यानी नेशनल सिटिजन रजिस्टर (NRC) के निर्माण का मकसद असम में रहने वाले भारतीय नागरिकों और वहां अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान करना था। अगस्त 2019 में आई अंतिम सूची में राज्य के 3.29 करोड़ लोगों में से 3.11 करोड़ लोगों को भारत का वैध नागरिक करार दिया गया, वहीं करीब 19 लाख लोग इससे बाहर हैं। फाइनल NRC में उन लोगों के नाम शामिल किए गए, जो 25 मार्च 1971 के पहले से असम के नागरिक हैं या उनके पूर्वज राज्य में रहते आए हैं। अब केंद्र सरकार का कहना है कि यह विधेयक असम तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे पूरे देश में लागू किया जाएगा। 

एनआरसी से कितना अलग है नागरिकता बिल?

नेशनल सिटिजन रजिस्टर के निर्माण का मकसद असम में रह रहे घुसपैठियों की पहचान करना था, जबकि नागरिकता संशोधन बिल का मकसद पड़ोसी मुस्लिम देशों में रह रहे स्थानीय अल्पसंख्यक समुदाय के उन लोगों को नागरिकता देना है, जो वहां की बहुसंख्यक आबादी द्वारा सताए जा रहे हैं। असम में रहने वाले ज्यादातर घुसपैठिये बांग्लादेश के हैं, जो अवैध रूप से भारत में घुसे हैं। वहीं इस नागरिकता संशोधन बिल के जरिए अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को वैध रूप से भारतीय नागरिकता दी जाएगी।

क्या है नागरिकता अधिनियम 1955? 

भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 में लागू हुआ था, जिसमें बताया गया है कि किसी विदेशी नागरिक को किन शर्तों के आधार पर भारत की नागरिकता दी जाएगी, साथ ही भारतीय नागरिक होने के लिए जरूरी शर्तें क्या हैं। इस बिल में अबतक पांच बार (1986, 1992, 2003, 2005 और 2015) संशोधन हो चुका है।

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