Day: September 18, 2019

वित्त वर्ष में 2019-20 की पहली तिमाही में सिर्फ 1.7 फीसदी रहा, पहली तिमाही में इकॉनमी रही सुस्त

वित्त वर्ष में 2019-20 की पहली तिमाही में सिर्फ 1.7 फीसदी रहा, पहली तिमाही में इकॉनमी रही सुस्त

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में गिरती महंगाई से यह संकेत मिलता है कि मांग में कमी आ रही है. रिजर्व बैंक की सालाना रिपोर्ट 2018-19 के मुताबिक खपत का जीडीपी में योगदान वित्त वर्ष 2012-14 के 71.5 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 2015-19 में 69.8 फीसदी ही रह गया.

उपभोग भारतीय अर्थव्यवस्था की तरक्की का बड़ा आधार है, क्योंकि जीडीपी में इसका सबसे बड़ा योगदान होता है, लेकिन हाल के वर्षों में इसका योगदान घटा है. शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में गिरती महंगाई से यह संकेत मिलता है कि इन दोनों इलाकों में मांग में कमी आ रही है. रिजर्व बैंक की सालाना रिपोर्ट 2018-19 के मुताबिक खपत का जीडीपी में योगदान वित्त वर्ष 2012-14 के 71.5 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 2015-19 में 69.8 फीसदी ही रह गया.

लगातार घट रही खपत  

इस दौरान निजी क्षेत्र का उपभोग पर खर्च यानी प्राइवेट फाइनल कंजम्पशन एक्पेंडीचर (PFCE) 66.2 फीसदी से घटकर 57.5 फीसदी रह गया है. यह मांग में कमी का संकेत देता है. हालांकि, इस दौरान सरकारी उपभोग खर्च यानी गवर्नमेंट फाइनल कंजम्पशन एक्सपेंडीचर (GFCE)  जीडीपी के 5.3 फीसदी से बढ़कर 12.3 फीसदी तक पहुंच गया है.

पिछले कुछ महीनों से तो और भी चिंताजनक संकेत मिल रहे हैं. PFCE वित्त वर्ष 2018-19 की तीसरी तिमाही के 58.8 फीसदी से घटकर चौथी तिमाही में 56.8 फीसदी और इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में महज 55.1 फीसदी रह गया.

इस गिरावट के बारे में रिजर्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है, ‘पीएफसीई में कमजोरी शुरुआती अनुमान से ज्यादा है और इसमें शहरी और ग्रामीण, दोनों इलाकों में कटौती हुई है जो इस बात का संकेत है कि अर्थव्यवस्था में गिरावट व्यापक है.’

कम महंगाई की चिंता

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में गिरती महंगाई से यह संकेत मिलता है कि इन दोनों इलाकों में मांग में कमी आ रही है. समूची (ग्रामीण और शहरी) उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी CPI आधारित महंगाई पिछले दो वित्त वर्ष में 4 फीसदी से नीचे ही रहा है.  वित्त वर्ष 2019 में ग्रामीण महंगाई 2.99 फीसदी और शहरी महंगाई 3.92 फीसदी रही है.

प्रति व्यक्ति आय बनाम प्रति व्यक्ति खपत

यह बात अब छुपी  नहीं है कि ग्रामीण और शहरी, दोनों इलाकों में लोगों की आय घट रही है. मांग में मौजूदा कमी की मूल वजह पर भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की साल 2019 की एक स्टडी के मुताबिक, शहरी और ग्रामीण वेतन-मजदूरी में भारी गिरावट आई है और यह आर्थिक सुस्ती की ‘सबसे महत्वपूर्ण’ वजह है.

स्टडी के मुताबिक कुछ साल पहले शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में लोगों के वेतन-मजदूरी (वेज) में दो अंकों में बढ़त हो रही थी. शहरी इलाकों में तो पगार में बढ़त साल 2010-11 में 20.5 फीसदी तक पहुंच गई थी और यह साल 2018-19 में घटकर एक अंक में आ गई. इसी तरह ग्रामीण वेतन-मजदूरी में बढ़त साल 2013-14 में 27.4 फीसदी के शीर्ष स्तर तक पहुंच गई थी, जबकि पिछले तीन वित्त वर्ष में तो यह घटकर 5 फीसदी से भी कम रह गया.

प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय (NNI) और प्रति व्यक्ति अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) में बढ़त के एक विश्लेषण से बहुत रोचक आंकड़े सामने आते हैं. दोनों वित्त वर्ष 2017 के स्तर से कम हैं. हालांकि वित्त 2019 में PFCE पिछले साल के 6 फीसदी से बढ़कर 6.8 फीसदी पहुंच गया, जबकि प्रति व्यक्ति NNI में गिरावट लगातार जारी है. यह वित्त वर्ष 2017 के 6.8 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 2018 में घटकर 5.7 फीसदी और वित्त वर्ष 2019 में 5.6 फीसदी रह गई.

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