Day: February 9, 2019

राष्ट्र निर्माण में बाबू जगदेव प्रसाद का योगदान’

आज 09/ 02/2019 को दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यकाम भवन में ‘‘राष्ट्र निर्माण में बाबू जगदेव प्रसाद का योगदान’’ जैसे महत्वपूर्ण विषय पर कार्यक्रम किया गया। जिसमें वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल की अध्यक्षता में मुख्य अतिथि के तौर पर प्रसिद्ध सामाजिक चिंतक, फिलॉस्फर, अन्तर्राष्ट्रीय भाषाविद् प्रो. राजेन्द्र प्रसाद सिंह मौजूद रहे। इस कार्यक्रम की प्रस्तावना डॉ. राम इकबाल कुशवाहा ने सबके सामने रखी तो वहीं मंच संचालन डॉ. रमाशंकर कुशवाहा जी ने किया। कार्यक्रम के शुरूआत में मुख्य वक्ता प्रो. राजेन्द्र प्रसाद सिंह का शोधार्थी राम विलास जी ने पुष्पगुच्छ देकर तो डॉ. एम रमानंदन सिंह जी ने मोमेंटो देकर स्वागत किया। कार्यक्रम के अध्यक्ष उर्मिलेश उर्मिल जी को पुष्पगच्छ मंजू देवी ने दिया और मोंमेटो डॉ. प्रमोद कुमार जी ने देकर स्वागत किया। साथ ही कार्यक्रम की प्रस्तावना को रखते हुए डॉ. राम इकबाल जी ने बाबू जगदेव प्रसाद के बहाने राष्ट्र के निर्माण में बहुजन समाज की भूमिका क्या है इस पर अपनी बात रखी और कहा कि जब तक 90 प्रतिशत जनता की भागीदारी, उसकी उपस्थिति राष्ट्र में नहीं होगी तब तक किसी राष्ट्र की परिकल्पना पूर्ण नहीं हो सकती। डॉ. रमाशंकर कुशावाहा संचालन करते हुए बाबू जगदेव प्रसाद के नारे को याद किया कि ‘‘दस का शासन नब्बे पर नहीं चलेगा, नहीं चलेगा। सौ में नब्बे शोषित हैं, नब्बे भाग हमारा है। धन-धरती और रारपाट में, नब्बे भाग हमारा है।’’ और कहा कि ओबीसी समाज में बहुत विकेन्द्रीकरण था वह अब केन्द्रीयकरण होने लगा है। वहीं कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने कहा कि देश मूर्त है और राष्ट्र अमूर्त। देश जबरन किसी शासक के द्वारा बनाया जा सकता है लेकिन राष्ट्र नहीं। राष्ट्र बनाने के लिए पूरे समाज को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्तर पर समानता होनी चाहिए। जो 90 प्रतिशत शोषित हैं उनको मुख्यधारा में लाए बिना राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता। साथ ही यह बताया कि राजनीतिक गुलामी तो कुछ ही सालों के लिए होती है लेकिन सांस्कृतिक गुलामी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। सर ने अपने सारगर्भित व्याख्यान में बाबू जगदेव प्रसाद के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन संघर्ष के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण बातें बतायीं। उन्होंने अब तक बाबू जगदेव प्रसाद पर जितनी जीवनी लिखी गयीं हैं, उन पर जितना काम किया गया है उस पर प्रकाश डाला तथा उनके साहित्यिक कार्य को महत्वपूर्ण बताया। आगे उन्होंने कहा कि वह मानते थे कि ‘भारत में वर्ग-संघर्ष नहीं, वर्ण-संघर्ष है।’ वह बिहार के लेनिन ही नहीं थे बल्कि मार्क्स और लेनिन दोनों थे क्योंकि मार्क्स ने सिर्फ सिद्धान्त दिया था लागू तो उसे बाद में रूस में लेनिन ने किया लेकिन बाबू जगदेव प्रसाद ने तो ‘शोषितवाद’ का सिद्धान्त दिया और उसे लागू भी किया। कार्यक्रम के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल जी ने अपने भाषण में कहा कि हमारे नायकों यानि की बहुजन नायकों को सातिरानेपन से नजरअंदाज किया गया है। साथ ही उन्होंने बहुजन नायकों के महत्व को व्याख्यित करते हुए कहा कि जब तक मैंने बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को नहीं पढ़ा था तब तक मुझे नेहरू और गाँधी का लेखन बहुत महत्वपूर्ण लगता था लेकिन जब मैंने अंबेडकर को पढ़ा तो मुझे नेहरू और गांधी का लेखन डॉ. अम्बेडकर के लेखन के आगे पिद्दी नजर आता है। डॉ. अम्बेडकर ने तो अकेले ही पूरे समाज को जगा दिया था उनका मानना है कि ईमानदारी और समझदारी के साथ समाज में उतरें तो समाज को और विकृत होने से बचाया जा सकता है। कार्यक्रम के अंत में डॉ. सुधांशु कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहा कि वैसे तो धन्यवाद ज्ञापन में कुछ और बोलने की परम्परा नहीं रही है लेकिन हम बहुजन आज इस परंपरा को तोड़ते हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के अंदर बहुजन लोगों की भागीदारी तथा उनपर हो रही राजनीति पर चर्चा करते हुए सभी को धन्यवाद ज्ञापन दिया।

अंतर्राष्ट्रीय भाषा वैज्ञानिक प्रो० राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने परिवर्तन साहित्यिक मंच से भोजपुरी भाषा की प्राचीनता पर प्रकाश डाला

नई दिल्ली : दिल्ली के दिल कनाॅट प्लेस के रेलवे आॅफिसर्स क्लब में अन्तर्राष्ट्रीय ख्यात भाषा वैज्ञानिक प्रो० राजेन्द्र प्रसाद सिंह का एकल व्याख्यान का आयोजन पुरवइया, नेशन लाईव व परिवर्तन साहित्यिक मंच के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 8 फरवरी 2018 को किया गया।
आयोजित इस एकल व्याख्यान में बिहार के वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा के प्रो० राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने भोजपुरी भाषा की प्राचीनता पर विस्तार पूर्वक बात रखते हुए अन्य भाषाओं में संस्कृत की भी प्राचीनता पर अपनी बात रखी। उन्होंने अपने वक्तव्य में बताया कि भोजपुरी की प्राचीनता वेदों के रचना से भी पहले की है। क्योंकि भोजपुरी के बहुत से शब्द आपको वेदों में मिलती हैं। और किसी भी आलेख या पुस्तक के लेखन शब्द उन्हीं भाषा के लिए जाते हैं जो वहां व्यवहारिक जीवन में बोली जाती हो। उन्होंने बहुत से उदाहरण देकर इसको परिभाषित किया। उन्होंने आगे कहा कि संस्कृत से भी पुरानी भाषा प्राकृत है। इसको भी उन्होंने उदाहरण के साथ साबित करने का काम किया।

आयोजित हुए इस कार्यक्रम में पुरव इया (रजि०) द्वारा Language, linguistics & historiography के लिए “Pedagogical excellence Award” अवार्ड से तथा परिवर्तन साहित्यिक मंच द्वारा “फणीश्वर नाथ रेणु शिखर सम्मान-2019” से प्रो० राजेन्द्र प्रसाद सिंह को सम्मानित किया गया। इसके अलावें डाॅ उज्जवल आलोक (जेएनयू) को “ई-लर्निंग के लिए व डाॅ कुमारी सीमा (जेएनयू) को “भाषा एवं साहित्य” के लिए “Pedagogical excellence Award” से सम्मानित किया गया।
परिवर्तन साहित्यिक मंच की ओर से कवि तेजप्रताप ने प्रो राजेन्द्र प्रसाद सिंह को शाल ओढ़ाया और कवि रजनीश सचान ने शिखर सम्मान की स्मृति चिन्ह भेंट की।

वही पुरवैया की ओर से नेशन लाइव के एडिटर इन चीफ धनञ्जय कुमार सिंह व कवि व पुरवैया के संस्थापक सन्तोष पटेल ने स्मृति चिन्ह प्रदान किया।
साथ ही जे एन यू की शोधार्थी जुली रानी की पुस्तक का लोकार्पण प्रो० राजेन्द्र प्रसाद सिंह के हाथो किया गया।

आज के इस कार्यक्रम का संचालन भोजपुरी जन जागरण अभियान के अध्यक्ष संतोष पटेल ने किया जबकि विषय प्रवर्त्तन प्रसिद्ध आलोचक जय प्रकाश फाक़िर ने किया। वहीं धन्यवाद ज्ञापन रेलवे में प्रबंधक व कवि तेज प्रताप ने किया। उपस्थित लोगों में कवि रजनीश सचान, अभिनेता अभिषेक भोजपुरिया, जेएनयू में शोधार्थी जुली रानी, दिल्ली विवि में शोधार्थी कन्हैया कुमार यादव, भोजपुरी जन जागरण अभियान के राष्ट्रीय प्रवक्ता व अधिवक्ता संतोष कुमार यादव, शोधार्थी धर्मवीर यादव, उज्जवल आलोक साहित्य संचय के प्रमुख मनोज कुमार, आदि थे।

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